बार्टर का बटर वाया लाहौर टू तोरा बोरा

बरसों पहले नेताजी सुभाष चन्द्र बोस ने एक नारा दिया था “तुम मुझे खून दो ,मैं तुम्हें आजादी दूंगा!” अच्छी पहल थी देश में इस नारे को आज भी बहुत इज्जत दी जाती है । लोग नेता जी के एक आह्वान पर अपना घर -बार त्याग कर अपना जीवन दांव पर लगाकर आजादी हासिल करने निकल पड़े।

इस पसमंजर में अपनी आजादी गंवा चुके अफगानिस्तान में आजादी हासिल होने का एक नया शिगूफा छोड़ा गया है । हमारे आजाद देश में भी आजादी मांगने वाले चंद लोगों ने तालिबानियों को आजादी की मुबारक बाद भेजी है । “नेशन वांट्स टू नो ” कि ऐसे आजादी प्रेमी आजादी का पर्याय माने जाने वाले भारत में रहना चाहेंगे या फिर काबुल-कंधार में तालिबानियों की दी गयी आजादी में अपना आशियाना बनाएंगे? इस सवाल पर आजाद देश में आजादी मांग रहे लोग बहुत तिलिमलाये हुए हैं, ये तो वही बात हो गयी –

“परदा हटाते भी नहीं, चिलमन से जाते भी नहीं "।

लेकिन हमारे पड़ोसी मुल्क पाकिस्तान ने एक नया शिगूफा छोड़ा है अपने पड़ोसी देश अफगानिस्तान को लेकर…  

“तुम हमें लूटपाट करने दो ,हम तुम्हें मान्यता देंगे। तुम हमें बताना कि सबसे आधुनकि हथियारों के सहारे मध्य युग के कबीलाई कानून कैसे लागू किये जाते हैं, हम तुम्हे बताएंगे कि किस्तों-किस्तों में अपना मुल्क कैसे तुड़वाया और बेचा जाता है “।

बाबा नागार्जुन की कविता अफगानिस्तान और पाकिस्तान दोनों तालिबानियों के हालात को बयां करती है –

“छीन सको  तो छीन लो,लूट सको तो लूट

मिल सकती कैसे भला,अन्न चोर को छूट “।

लेकिन पाकिस्तान और अफगानिस्तान के तालिबानियों को हर किस्म की लूट करने की पूरी छूट मिली हुई है । इतना लुटा है कि अवाम कराह रही है ।

अफगानिस्तान फिलहाल दुनिया के लिये अजूबा देश बना हुआ है । अफगानिस्तान की लड़ाई भी दिलचस्प है, जहाँ तीन लाख प्रशिक्षित हथियारबंद वेतनभोगी सैनिक ऐसे तीस हजार लोगों से हार गए जिनके पैरों में साबुत चप्पल तक नहीं थी। वाकई ये बहादुर अफगानियों की वीरता की मिसाल थी जो तीस हजार लोगों ने तीन लाख की फौज को हरा दिया । अगर तीस हजार गर्वित अफगानी थे तो तीन लाख रण छोड़ने वाले भी तो अफगानी ही थे, यकीनन वो टिम्बकटू से नहीं आये थे ।

 इधर रेम्बो की एक फ़िल्म का एक सीन बहुत वायरल हो रहा है कि लोग कहते हैं कि “मुझे चीते जैसी फुर्ती, सांप जैसा जहर और अफगानी लड़ाकों जैसी हिम्मत मिले” यकीनन यही हिम्मत अशरफ गनी और उनके लड़ाकों में थी, क्या कहने… रेम्बो भी अपनी उस डायलॉग वाले दृश्य पर शर्मिंदा हो रहा होगा।

अफगानिस्तान की लड़ाई भी अजीब ही रही हिंदी सिनेमा में बहादुरी के पर्याय माने जाने वाले अफगानी लड़ाकों की वीरता अद्भुत है जो अपने को ऐसे लोगों के खिलाफ विजित मान रहे हैं जो कभी लड़े ही नहीं ।

अमेरिका टू अफगानिस्तान

“तुम्हारे मुल्क  में ना तो तेल है ना मसाले सो अब हम जा रहे हैं । ओसामा और मुल्ला उमर भी अब तुम्हारे पास नहीं रह गए ।तो अब डॉलर नहीं दे पाएंगे। अब हमारे संसाधन कम पड़ रहे हैं, मुफ्त की रोटियां हम किसी को नही  खिला सकते सो हम परदेसी चले अपने वतन!”

अमरीका चला गया और तालिबान जीत गए। ये ऐसा ही था कि एक पहलवान अखाड़े में जब तक चुनौती देता है तब तक कोई उसकी चुनौती स्वीकार करने का साहस नहीं करता, लेकिन जब विजित पहलवान कूच कर चुका होता है तब एक और पहलवान आकर अखाड़े में कहता है कि देखो वो पहले वाला पहलवान मेरे डर से चला गया।

पलायन से खाली की गई जमीन और युध्द में छोड़े हथियार से तालिबान को सत्ता तो मिल गयी, लेकिन पहले दिन ही तालिबान टू वर्ल्ड –

“मुल्क चलाने के लिये हमारे पास धन नहीं है । हमारे आका पाकिस्तान ने हमें सिखाया है कि सबसे पैसा मांगों, पहले दिन से पैसा मांगो। भले ही खुद लड़ -भिड़ कर अपना देश नष्ट कर दो, फिर दुनिया से कहो कि इस घायल देश को बचाना पूरी मानवता की जिम्मेदारी है। दाता-धर्मी दान करेंगे ही सो पैसा मांगना शुरू कर दो, मांगना और मांगते रहना हमारे खित्ते का सबसे नायाब नुस्खा है ।इसलिये सब हमें पैसा दो, अमेरिका हमें डॉलर दो, ईरान हमें तेल दो, इंडिया हमें अनाज दो, हमारे लिये पुल, सड़कें और स्कूल बनाओ । हमारे अस्पतालों में दवा भरो.”

इंडिया टू तालिबान

“लाज़िम है हम भी देखेंगे”।

पाकिस्तान टू तालिबान

“बस इत्ती सी बात हमको देखो हमारे पास पिछले दो दशक से देश चलाने को धन नहीं है, लेकिन कर्ज़, भीख, अनुदान से हम देश तो चला ही रहे हैं। हमने सन 2001 में ही कह दिया अमेरिका से कि हमारे पास ओसामा बिन लादेन नहीं, लेकिन हमने एक दशक तक पाकिस्तान में लादेन को छुप-छुपाकर चलाया ना, हमारे क्रिकेट बोर्ड में धन नहीं है, पूरी दुनिया में कोई हमसे क्रिकेट नहीं खेलता, लेकिन हम पाकिस्तान प्रीमियर लीग चला रहे हैं ना। हमारे यहां डेमोक्रेसी नहीं है लेकिन दुनिया भर के अनुदान लेने के लिये हम डेमोक्रेटिक मुल्क चला रहे हैं। जो हमारे पास ना हो उसे हम बहुत अच्छे से चलाते हैं, अब देखो ना कश्मीर में हमारी पैठ नहीं रह गयी लेकिन हम कश्मीरी एजेंडा बखूबी चला रहे हैं और दुनिया भर में फैले पाकिस्तानी कश्मीरियों से अच्छा -खासा चंदा भी वसूल रहे हैं”।

तालिबान टू पाकिस्तान-

“लेकिन तुम्हारे पास सोने-तांबे से भरा बलूचिस्तान है, चंदा वसूलने के लिये कश्मीर का एक  हिस्सा है। कहने को एटम बम है, क्रिकेट का एक वर्ल्ड कप है । हमारे पास क्या है, कोई हमें कर्जा क्यों देगा ?”

पाकिस्तान टू तालिबान

“तुमने हमारे टेरर फैक्ट्री को नजरअंदाज कर दिया । दुनिया भर में हमसे बड़ा टेरर का एक्सपोर्टर कोई नहीं । हमारी तहरीक ए तालिबान पाकिस्तान को देखो, उसी की मदद से आज तुमने पूरे अफगानिस्तान पर कब्जा कर लिया । हम पूरी दुनिया में बम फोड़ते हैं सिवाय चीन के । चीन के उएगीर लोगों की बम -बंदूक से मदद ना करने की गारंटी पर हम चीन से कितनी मोटी रकम ऐंठते हैं । लोग कहते हैं कि पूरा पाकिस्तान चीन के पास गिरवी पड़ा है। उन कमअक्लों को ये नहीं मालूम कि गैरतमंद के गिरवी की कोई कीमत होती है, भिखारी और दिवालिया के गिरवी होने की कोई कीमत नहीं होती, अपनी सारी कीमत, नेमत गंवाकर ही कोई इदारा दिवालिया बनता है । अब तुम भी इसी राह पर चलो, चीन से कह दो कि हमें कर्जा दो, वरना हम उइगर के विद्रोहियों की मदद करेंगे, वो तुरन्त मदद को तैयार हो जाएगा। हमने पिछले बीस सालों से दुनिया को इसी बुनियाद पर ठगा है कि हमें पैसा दो, वरना हमारे मजहबी लड़ाके तुम्हारे देश में घुस कर बम फोड़ेंगे तो हमारी कोई ज़िम्मेदारी नहीं होगी । और फिर देखो कैसे पैसा बरसता रहा !”

तालिबान टू पाकिस्तान

“लेकिन तुम खुद तो दुनिया भर से पैसा लेते हो और हमें सिर्फ चीन से पैसा लेने को कह रहे हो, ऐसा कैसा चलेगा!”

पाकिस्तान टू चीन – “ देखो तुम्हारी टेरर फैक्ट्री अभी आर्गनाइज्ड नहीं है । हमने यूनिवर्सिटी बनाई, एयरपोर्ट बनाया, जहाजों का फ्लीट रखा है और कहने को तालिबान खान नियाजी उर्फ इमरान खान नाम का एक प्लेबॉय टाइप का प्राइम मिनिस्टर भी बना रखा है । इसलिये दुनिया हमें मान्यता देती है, पहले मान्यता देती है फिर भीख भी, डायरेक्ट भीख ज्यादा नहीं मिलती”।

तालिबान टू पाकिस्तान

“हमारी फिलासफी अलग है, हम मानते हैं कि पढ़ लिखकर आप पायलट बन सकते हैं लेकिन तालिबानी बंदूक उठाकर पूरे एयरपोर्ट के हर जहाज का मालिक बन सकता है। पढ़ -लिख कर आप सेंट्रल बैंक के गवर्नर बन सकते हैं लेकिन बंदूक के बल पर आप फाइनेंस मिनिस्टर ही ना बन जाएं। पढ़ -लिख कर आप यूनिवर्सिटी में लेक्चरर बन सकते हैं लेकिन तालिबानी बन्दूकधारी उसी यूनिवर्सिटी का चांसलर बन सकता है । हमारे एडुकेशन मिनिस्टर ने तो कहा है कि एमबीए, पीयचडी सब बेकार है, बस बंदूक चलाना आना चाहिये । इसीलिये हमारे मुल्क में सब्जी के ठेलों पर हथियार बिकते हैं । बस हमको भी दुनिया भर से फ्री का पैसा खाने का तरीका बताओ?”

पाकिस्तान टू तालिबान

“तब हम बार्टर सिस्टम पर काम करेंगे । मतलब तू मेरे को मान्यता दे, मैं तुझे मान्यता दूंगा। तू हमारे मुल्क में बम फोड़वा, हमारी आईएसआई तेरे मुल्क में बम फोड़ेगी। हम दोनों आलमी बिरादरी में हल्ला मचाएंगे कि हम आतंकवाद से पीड़ित हैं और फिर हमारे मुल्क तबाह होते रहेंगे और दुनिया हमें पुनर्निर्माण के लिये धन देती रहेगी। और इस तरह हमारा बार्टर सिस्टम चलता रहेगा।”

पाकिस्तान के सदर तालिबान खान और इमरान खान के मुंह से ये बात सुनकर उसकी टेरर बिरादरी के नेता मुल्ला बिरादर की आंखों में आंसू आ गए, दोनों तालिबान एक दूसरे से गले मिले और फिर उन्होंने अमेरिका को कोसते हुए एक अमेरिकन ब्रांड की व्हिस्की निकाली और चीयर्स करने लगे। उनके नेपथ्य में हिपहॉप संगीत बज रहा था लेकिन कुछ लोगों को इसमें निर्दोष अफगानों की चीखों का इम्कान हो रहा था ।

अमन सलामत रहे ! आमीन !!

आलेख : दिलीप कुमार | मुम्बई | कथाकार-व्यंगकार

कार्टून्स: अभिमन्यु सिन्हा | दिल्ली

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