भेड़ को महज़ भेड़ मानने की भेड़ चाल से बचें !!

अब भेड़ को भेड़ नही कहेंगे तो क्या कहेंगे? लेकिन मेरा मन है कि मानता नहीं! आदमी के पास भाषा है भाषा में अर्थ है। इसी अर्थ के होने ने व्यंजना के ऐसे कूट रच डाले हैं कि भेड़, गदहा और उल्लू जैसे शब्दों के वास्तविक अर्थ पर आरूढ़ अर्थ भारी हो गया है। भेड़, गदहा और उल्लू गाली लगने लगे हैं।

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भेड़ कल गुस्सा हो गई। गडरिया चरनोई ले जाते हुए रेवड़ हाँक रहा था कि मुझे देख एक भेड़ रुक गई। मुझसे उलझ गई। बोल रही थी – ‘तुम हिन्दी वालों ने आखिर हम भेड़ों को समझ क्या रक्खा है?’ मैंने कहा – ‘भेड़, और क्या?’ बोली – ‘वह तो हम हैं ही, लेकिन हमारे क्रिया कलापों पर आप मनुष्य लोग अपने आरोप थोपकर हमें क्यों बदनाम करते हो?’ मैंने कहा – ‘मेरे द्वारा तो ऐसा अपराध न हुआ, हाँ स्वयम्भू लेखक /लेखिकाओं की नही कह सकता!’ वह बोली -‘अपने पाप खुद उठाओ, इस प्रकार दूसरों के नाम पर अपने करम क्यों थथेड़ते हो?’ इतना सुन मैं सकपका गया! क्या कहता उसे?

भेड़ भी मनुष्य के प्रारंभिक जीवन काल की सहयात्री रही है। मानव सभ्यता की आदि-सहयात्री! सृष्टि प्रलय के रूपक आधार पर प्रतीत होता है कि महाराज मनु ने पहले पहल भेड़ को ही रक्षित किया होगा! विश्व की सभी आदिसभ्यताओं में मेष का अपना स्थान और महत्व है। मनु महाराज को सर्व प्रथम वल्कल की आवश्यकता अनुभव हुई होगी तब पहला बुना गया वस्त्र ऊन का ही रहा होगा, जिसे राज्ञी श्रद्धा ने अपनी तकली से बुना होगा, कामायनी तो यही कहती है-‘कोमल काले ऊनों की नव-पट्टिका बनाती रुचिर साज।” (ईर्ष्या सर्ग) सिद्ध है कि हिमगिरि के उत्तुंग शिखर पर भेड़ या भरल ने अपने “मसृण गांधार देश के नील रोम वाले मेषों के चर्म” देकर ही शीत से रक्षा की होगी! 

वैदिक साहित्य में मेष से मिलने वाले ऊन को’ ऊर्ण’ के नाम से जाना गया। पश्म की जानकारी भी प्राप्त होती है जो मेष या हिमालयी बकरी की नस्ल है। इसका तात्पर्य हुआ कि ‘गाडर’ का सानिध्य पुराना बहुत पुराना है! प्राचीन साहित्य में मेष को कितने सम्मान के साथ वर्णित किया गया श्रृंगी, लोमश, सुग्रीवी जैसे सुन्दर शब्द विन्यास के साथ? हाय… आज के लोगों को देखो जैसे मेषों ने ही उनके बाप मारे हों! हाँ नईं तो क्या? ऋग्वेद का ‘पुरुरवा उर्वशी संवाद’ जिसमें उर्वशी की दो भेड़ें विश्वावसु गन्धर्व चुरा कर ले जाता है! यह भेड़ों के प्राचीन औदात्य का प्रतीक ही तो है! क्या वैदिक साहित्य में भेड़ों के फूहड़ मुहावरे वर्णित हैं? जैसा आज के स्वनामधन्य मनीषी करते हैं! उर्वशी जैसी स्वर्ग की अप्सरा के प्रिय मेष होने का चरम सुख और किस अन्य जीव को कभी मिला होगा? यदि यह कल्पना भी है तो मेष के लिए कितने सम्मान, कितनी उपलब्धि का विषय है! वारी जावाँ ऐसे साहित्य पर! 

“अभि त्यं मेषं पुरुहूतमृग्मियमिन्द्रं” ऋचा में मेष शब्द को मिष धातु से निष्पन्न मानकर ‘शत्रुओं से स्पर्धा करनेवाला’ भी माना गया है और सुखों से सींचने वाला भी माना गया है, कथा है कि महर्षि कण्व के पुत्र मेधातिथि सोमयज्ञ कर रहे थे तब इन्द्र मेष का रूप धरकर आए और उनके सोमरस का पान कर लिया। तब मेधातिथि ऋषि ने मेष कहा था, इसलिए अब भी इन्द्र को मेष कहते हैं। इस कथानक के बाद तो भेड़ों को किसी अन्य पारितोषिक की आवश्यकता ही नहीं है! वे भी इन प्रकरणों के पश्चात गौ से स्पर्धा करने की स्थिति में लगती हैं! लेकिन हाय भारतीय इतिहास का मध्यकाल कितनी विपदा और वितृष्णा लेकर आया कि जिस सम्मान को पाया वह न जाने किस पूर्वजन्म के पापों के परिणामस्वरूप हत हुआ, क्षत हुआ, लथपथ हुआ! 

पवित्र गुरुग्रंथ साहिब में इन गाडर को अन्य जीवों के साथ माया में फँसा हुआ सिद्ध किया – “मांजार गाडर अरु लूबरा ॥ बिरख मूल माइआ महि परा॥” बाबा तुलसी ने भी भेड़ों के लिए – “तुलसी भेड़ी की धँसनि, जड़ जनता सनमान। उपजत ही अभिमान भो, खोवत मूढ़ अपान॥” (दोहावली) कहकर उपेक्षा भाव प्रकट किया! तेलुगु की रंगनाथरामायण में तो नन्ही गिलहरी के प्रति भी सम्मान कथा लिखी गई (सेतुबंध के समय श्रीराम जी गिलहरी के श्रम के पुरस्कार स्वरूप उसे अपने हाथों में उठा लेते हैं और पीठ पर हाथ फेरते हैं) फिर भेड़ से क्या गलती हुई…. पूछती है भेड़! 

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भारतीय ज्योतिष और विश्व के प्राचीन ज्योतिर्विज्ञान में भेड़ को सौरमंडल की पहली राशि मानकर महत्व दिया गया है। मेष को प्रथम राशि के रूप में यूनानी और अरब के लोग भी मानते रहे हैं! भले ही नाम उन भाषाओं में मेष की जगह क्रियोश हो, Aires हो, Ovan हो, Ram हो, Berbec हो, Obeh हो, Cung bach duong, या ‘अल-हामल’ कहा जाए (Collins dictionary अग्रांकित नाम क्रमशः यूनानी, अंग्रेजी, क्रोएशियन, डच, रोमेनियन, रशियन और वियतनामिश बताता है) उक्त सभी खगोल ज्योतिषी 0° से 30° डिग्री की पहली राशि मेष या भेड़ को ही मानते रहे हैं। आकाश के नक्षत्र समूह के पहले ढेर(राशि या Zodiac sign) में सभी ने गाडर का ही स्वरूप खोजा! है न इसकी महत्ता? (भले ही हमारे कुपढ़ लोग ज्योतिष में फलादेश नामक अनुमान आधारित कथन पर उपहास उड़ाएँ, लेकिन संसार भर के खगोलशास्त्री अपनी विद्वता में एक हैं) संभवतः मेष से मीन की ओर क्रमशः बढ़ना दोष रहित गति है और कोई मीन से मेष (माध्यंदिनी संहिता के व्याकरण अनुसार ‘ष’ को ‘ख’ पढ़ा जाता है ष के आगे यदि ट, ठ, ड, ढ, ण, न हो) की ओर उलटा चलता है तो ऐसी उलटगति को मीन-मेख दोष कहा गया है! यह मीन-मेष दोष, राशियों का नही अज्ञानियों का दोष कहा जाना चाहिए! 

विश्व की सभी प्राचीन सभ्यताओं की पड़ताल और संस्कृतियों के प्रथम पुरूषों की जीवनियाँ खोजी जाए तो उनका सानिध्य भेड़ के साथ जुड़ा हुआ है। अब्राहमिक पंथ के ईसा मसीह हो या हजरत मूसा, यहूदी सोलोमन हो या मोहम्मद साहब सभी गडरिये थे, मिस्र के पिरामिडों में भेड़ के अवशेष मिले हैं। हमारे देश के इतिहास प्रसिद्ध सम्राट चंद्रगुप्त मौर्य भी गडरिया थे, विजयनगर साम्राज्य के हरिहर और बुक्का राय जैसे योद्धाओं के बाद देवी अहिल्याबाई भी गडरिया समुदाय से थी। मध्यकाल में आक्रान्ता तैमूर लंगड़ा जरूर भेड़ों का चोर बताया जाता है। लेकिन उसका जीवन भी आखिर भेड़ के चरवाहे से लोहार में परिवर्तित हुआ था। 

बहुत बातें हुई कि वेद, पुराण और इतिहास क्या कहता है? इनसे विलग चलती है लोकश्रुति हिमालयी पहाड़ी जीवन में कथा है कि भगवान शंकर की बारात रास्ता भटक गई थी तब भेड़ों के चरवाहे ने ही पर्वतराज का रास्ता बताया था। भेड़ से जुड़ी एक आश्चर्यजनक बात जानने योग्य है। उत्तराखंड में बारह वर्ष में एक बार नंदादेवी राजजात का आयोजन होता है (पिछली राजजात २०१४ में हुई थी) यह यात्रा चमोली जिले के नौटी गाँव से प्रारम्भ होती है और होमकुण्ड तक २५० किमी तक जाती है। इससे आगे नंदादेवी शिखर के दर्शन कर यात्री लौट आते हैं। पहाड़ी जनजीवन नंदादेवी को साक्षात शिवजी की पत्नी मानकर पूजता है। इस राजजात या राजयात्रा का नेतृत्व एक भेड़ करता है होमकुण्ड तक लोग साथ जाते हैं लेकिन आगे वह भेड़ स्वयं नंदादेवी शिखर की ओर बढ़ जाता है। उत्तराखंड में उस भेड़ को चौसिंग्या खाड़ू कहते हैं, चौसिंग्या का तात्पर्य है कि जिसके चार सिंग हों। यह बारह वर्ष में एक बार उसी हिमालय पट्टी के किसी गाँव में जन्म लेता है और उसके जन्म लेते ही विशेष घटनाएँ घटित होने लगती है। पिछली बार चौसिंग्या खाड़ू २०१३ में लुंतरा गाँव में तथा २०१४ में सूंग गाँव में जन्मा था बताया जाता है। चौसिंग्या खाड़ू ही नंदादेवी जो कि अपने पीहर आई होती है उनका सामान लेकर उन्हें ससुराल विदा करने आता है। उत्तराखण्ड में आगामी राजजात २०२६ को होगी, किन्तु नंदादेवी लोकजात प्रतिवर्ष होती है आगामी अगस्त में होगी। 

भेड़ या खाड़ू पर हमारा आधुनिक समाज व्यंग्य और तिरस्कार की भावना रखते हुए कितने ही मुहावरे गढ़ता है। देश – विदेश की कथा कहानियाँ भेड़ों को नाकारा, अन्धानुकरण करने वाली द्योतित करता है, भेड़चाल का अर्थ अंधानुकरण से लगाया जाता है एक के पीछे एक चलना बुरा माना जाता है, उनकी समूहजीविता को उपहास बनाया जाता है लेकिन मधुमक्खियों के समूह जीवन को कभी व्यंग्य की दृष्टि से नही देखता क्योंकि वह आक्रमण करती है तो मुखाकृति बिगाड़ देती है। समाज में सीधा होना भी बुराई का कारण है! 

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भेड़ को लेकर मैंने भारत के प्राचीन – अर्वाचीन को प्रस्तुत किया जिसमें साहित्य, लोकमान्यता, जनश्रुति आदि सम्मिलित हैं। अब पाश्चात्य के कुछ प्रचलित तथ्य बता रहा हूँ। हमारे भारतीय जनमानस में यह बात पैठ चुकी है कि जो ठीक है वह पाश्चात्य है और हमारी अपनी परम्परा दकियानूसी है, त्याज्य है। हम लोग महत्ता को जाने बिना परम्परा को नकारने और उसके उपहास के लिए तत्पर रहते हैं। जो पाश्चात्य है वह श्रेष्ठ है जो भारत का है वह हेय है तथाकथित बुद्धिजीवियों का पुराना शगल है। हमारे हिन्दी पाठ्यक्रमों में प्रायः हम सबने गाय के निबन्ध पर व्यंग्य करते हुए, पालतू पशुओं के प्रति दूरी का भाव परोसते भारतीय पालक देखें हैं, लेकिन जब पालतू कुत्ते, बिल्लियों की बात आती है तो हमारे नवअधुना लोग पाश्चात्य का पश्चानुगमन करते हुए पड़ोसी के साथ अल्सेशियन, जर्मन शेफर्ड आदि नस्लों पर चर्चा जरूर करते हैं ताकि पड़ोसी को लगता रहे के वे स्वयं समय के साथ कितने कदमताल चलते हुए बहुत जानते भी हैं! लेकिन किसी ने यह पता किया है कि वर्तमान पाश्चात्य संस्कृति के पुरोधा ब्रिटेन और अमेरिका अपने बच्चों को क्या पढ़ाते हैं? चलिये मैं बताता हूँ – सन अठारह सौ के आसपास पूर्वी यूएस के बोस्टन शहर के पास एक ग्रामीण स्कूल में एक बच्ची अपनी भेड़ के मेमने के साथ चली आई, शिक्षक के मना करने के बाद भी न वह मेमना छोड़ने को तैयार थी न मेमना उस बच्ची का साथ छोड़ने के लिए तैयार हुआ। इस घटना की चर्चा चली और तब रचनाकार लॉवेल मेसन ने नर्सरी राइम्स के लिए जो कविता लिखी “मेरी हेड ए लिटिल लेम्ब, लिटिल लेम्ब!” यह आज भी यूएस, ऑस्ट्रेलिया, ब्रिटेन के पाठ्यक्रमों के साथ भारत में भी पढ़ाई जाने लगी है, यानी भेड़ ने बच्चों में घुसपैठ बना ली है। दूसरी घटना भी ऊन पर लगे भारी कर (टेक्स) के विरोध में लिखे एक गीत के माध्यम से पाश्चात्य जगत में इतनी प्रचारित हुई कि नर्सरी राइम्स के रूप में आज भी पढ़ाई जा रही है – “बा.. बा.. ब्लेक शिप हाउ एनी वूल?” (इसमें पहले शब्द बा.. बा… का तात्पर्य भेड़ की बोलने की ध्वनि है) “यस सर, यस सर, थ्री बेग फूल, वन फार द मास्टर, वन फार द डेम (मालकिन)!” इस रचना को सामंतवादी व्यवस्था का प्रतीक मानकर विरोध भी हुआ है लेकिन चल आज भी रही है और अब यह भारतीय स्कूलों में घुस रही है। यानी भेड़ लाख बुराई की प्रतीक होकर भी बच्चों की अभिन्न मित्र है, समझना होगा! इस अवसर पर थॉमस डर्फ की लिखी हुई रचना “ओल्ड मेक्डानल्ड हेड ए फार्म.. इ.. या.. इ… या… ओ.. ओल्ड मेक्डानल्ड हेड ए शिप.. इ.. या… इ… या.. ओ..” के साथ सूअर, मुर्गा, गाय, घोड़ा, कुत्ता सभी बूढ़े मेक्डानल्ड के खेत में होते हैं और बड़ी लय के साथ मेक्डानल्ड को नर्सरी राइम्स में गाया जाता है। 

कोरोना जैसी महामारी और परमाणु बम के युग में धरती पर जीवन की प्रत्याशा को सम्हाले रखने में मंगल ग्रह की धरती पर पानी की खोज चल रही है, वैज्ञानिक वहाँ बम एक्सप्लोजन के साथ वायुमंडल निर्माण तकनीक में जुटे हैं ताकि आगामी सत्तर अस्सी साल बाद यदि मानवता को बचाने हेतु यह धरती सुरक्षित न हो तो महाराज मनु की प्रलय के समय नौका में रखे गए जीवों, या एडम्स और इव के संरक्षित जीवों की तरह आज के वैज्ञानिक भी जिन जीवों को अपने साथ मंगल ले जाएँ उसमें भेड़ भी जरूर होगी, आशा करता हूँ! आखिर जिन वैज्ञानिकों ने अपने बचपन में बा… बा… ब्लेक शिप अथवा मेरी हेड ए लिटिल लेम्ब पढ़ा होगा वे उस भेड़ और गाय को कैसे भूल जाएँगे भला आप बताएँ? 

  • गजेन्द्र पाटीदार, हिंदी  साहित्यकार

231, कालिका देवी मार्ग, सुसारी,  तह. – कुक्षी, जिला – धार, मध्य प्रदेश – 4545331
मोब – 9893713338

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