बहुरिया कॉलिंग-विवाहितो के लिए नुस्खा !

खास करके उनके लिए जिनकी नई-नई शादी हुई हैं, या फिर होने वाली हैं !

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एक मास्टर जी थे पढ़ाने के साथ-साथ व्यवहारिक और नैतिक ज्ञान भी ख़ूब देते थे। एक दिन टॉपिक रख दिए – बीवी को कैसे बुलाओगे ? सिचुएशन कुछ इस तरह हैं – यदि आपकी बीवी आंगन में आपके आस-पड़ोस की चाचियों दादियों, भाभीयों, बहनों आदि की मंडली के साथ बैठी हो और उसमें आपकी माँ भी शामिल हो, और आप घर के अंदर अकेले हो.. ऐसे में आपको अपनी बीवी को अंदर बुलाना हैं कुछ इस तरह से कि मंडली में बैठी किसी भी महिला को बुरा न लगे या फिर कोई प्रेमरस के कमेंट न पास करे, तो आप कैसे बुलाओगे ??

लगे सब छात्र दिमाग भिड़ाने (ऐसी बातों में दिमाग ही भिड़ाया जाता हैं दिल नहीं ).

अब मितन रजवार उठा और बोला – सर, हम अपनी बीवी का नाम ले के बुलाएंगे. जैसे .. ऐ सरिता तनिक अंदर आव तो.


मास्टर जी – मालुम हैं रे….तुम्हारी ददिया का बोलेगी, आज कल के लड़के सब भी न,टीभी देख-देख के गाँव के मान-मर्यादा सब भूलने लगे हैं. बीवी का नाम ले के बुलाने लगे हैं लौंडे. हमरा तो आपन नाम तबे याद आता हैं जब हम भोट देने जाते हैं।… अरे मितना तुम्हारा ये बीवी का नाम ले के बुलाने वाला युक्ति काम नहीं करेगा रे. दादी को बुरा लग जाएगा।
मैं क्लास का रोल नं -01 बंदा, मैं उठा और बोला – सर, मैं अपने बच्चे के नाम की माँ कह के बुलाऊंगा , मतलब सर अगर मेरी बेटी का नाम फुल्की हैं तो हम उसे फुल्की की माँ कह के बुलाऊंगा । ऐ.. फुल्की की माँ तनिक अंदर आव तो ।
मास्टर जी – 

हाँ… ई तनिक ठीक हैं, लेकिन रुको… मान लो तुम्हारी नई-नई शादी हुई हैं और तुम्हारा कोई बच्चा-वच्चा नहीं हैं तो फिर कैसे बुलाओगे ? 


मैं – फिर तो पता नहीं सर…
रामेसर ठाकुर उठा और बोला – सर , हम ऐसे बुलाएंगे… ओ जी….ज़रा अंदर आना एक काम हैं…मतलब सर हम किसी बहाने से अंदर बुला लेंगे।
मास्टर जी – मालुम है रे रमेसरा तुम्हारी पड़ोस वाली भाभी क्या बोलेगी,… छोड़ा से बीवी की जुदाई एक पल भी बर्दाश्त नहीं होता हैं. अरे सगर घरी तो तुम्हारे पास ही रहती हैं, पाँच-दस मिनट के लिए हमारे साथ बैठ लेगी तो क्या जाएगा तुम्हारा. ज़रा भी जुदाई बर्दाश्त नहीं होता. जा बहिन नहीं तो बुरा मान जायेगा रामेसर बाबू. ….और फिर सब ठहाके मार के हसेंगे रे रामेसर… न न ई आईडिया तो पूरा फ़ैल!


फिर धनेसर महतो उठा – सर, हम आँख मार के बुलाएंगे।
मास्टर जी – और अगर तुम्हारा आँख मारना किसी अन्य भाभी ने देख लिया ना , तो तुम्हारी आँखें नोच डालेगी रे धनेसरा ।
फिर सीताराम तुरी उठा – सर, हम कंकड़ मार के इशारे से बुलाएंगे।


मास्टर जी – ई सीताराम थोड़ा पहुँचा लगता हैं. लेकिन वो पत्थर अगर किसी दूसरी औरत को लग गया तब रे सीताराम । न न ये थोड़ा रिस्की हैं। कोई और तरीका बताओ रे जिसमें रती भर का भी रिस्क न हो … ,हैं कोई और नया तरीका बताने वाला ? 
अब हमारा थिंक टैंक खाली हो चुका था . हमलोगों ने मास्टर जी से आग्रह किया, अब आप ही बता दीजिये सर. हमलोगों के पास अब कोई अन्य आईडिया नहीं हैं।
मास्टर जी – अरे अपनी बीवी को बुलाना हैं ना बिना किसी को बुरा लगे तो अपनी माँ को बुलाव रे,.और थोड़ा ज़ोर से चिल्ला के ..मैया ऐ मैया….कहाँ ही गे.हमर नयका वाला फुलपेंटवा कहाँ रख देल्ही गे, ढूंढ़ रहे हैं कब से मिल ही नहीं रहा हैं,मैया… ये मैया..~~~….


तुम्हारी माँ खुद तुम्हारी बीवी को भेजेगी – अगे ये बपढोहनी…. जा के तनिक देखो न जल्दी से बेटवा के हमर..अंदर चिल्ला रहा हैं, फुलपेंटवा नहीं मिल रहा हैं और तुम यहाँ बैठ के बातें कुंद रही हो.अरे जाव..अब हम कितना ख़याल रखेंगे। 

बीवी फ़ौरन भाग के अंदर आयेगी रे तुम्हारे पास,और किसी को कुछ भी बुरा नहीं लगेगा। समझे।

  • गंगा महतो, खोपोली | लेखक पेशे से मेकेनिकल इंजीनियर हैं. और मशीनो की खट-पट के बीच भी कुछ नट-खट सोच लेते हैं और खांटी देहाती अंदाज़ में परोस देते हैं.

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